निरूपा रॉय: image credit social media

बॉलीवुड की “मां” निरूपा रॉय: एक किरदार जिसने दिलों में घर कर लिया

बॉलीवुड की “मां” निरूपा रॉय: एक किरदार जिसने दिलों में घर कर लिया

भारतीय सिनेमा में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपनी फिल्मी भूमिकाओं के लिए नहीं, बल्कि एक पहचान और भावना के प्रतीक बन जाते हैं। ऐसी ही एक अभिनेत्री थीं निरूपा रॉय, जिन्हें बॉलीवुड की “मां” के रूप में याद किया जाता है। 13 अक्टूबर 2004 को उनका निधन हो गया, लेकिन मां वाली उनकी भूमिका आज भी भारतीय दर्शकों के दिलों में जिंदा है। उनका यह किरदार इतना प्रभावशाली था कि हर दर्शक ने उन्हें अपनी मां के रूप में महसूस किया।

निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के वलसाड जिले में कांता चौहान के नाम से हुआ था। कम उम्र में ही उनके जीवन में कई जिम्मेदारियां आ गई थीं। मात्र 14 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कमल रॉय से हुआ और इसके बाद वे अपने पति के साथ मुंबई आ गईं। कमल रॉय का सपना फिल्मों में काम करने का था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। फिर उन्होंने सोचा क्यों न उनकी पत्नी को भी फिल्मी दुनिया में मौका दिया जाए। इसी सोच के साथ दोनों ने गुजराती फिल्म ‘रणकदेवी’ के लिए ऑडिशन दिया। इस फिल्म में कमल रिजेक्ट हो गए, लेकिन निरूपा को लीड रोल ऑफर हुआ। इसी तरह उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई।

शुरुआती दौर में निरूपा रॉय ने धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों में काम किया। उन्होंने ‘हर हर महादेव’, ‘रानी रूपमती’, और ‘नागपंचमी’ जैसी फिल्मों में देवी के किरदार निभाए। इन भूमिकाओं के कारण दर्शक उन्हें देवी के रूप में देखने लगे थे। उनके अभिनय में जो शुद्धता और भक्ति थी, वह दर्शकों के दिलों को छू गई। धीरे-धीरे निरूपा रॉय ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई और सामाजिक फिल्मों में भी कदम रखा।

उनकी शुरुआती फिल्मों में एक खास फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ शामिल है, जिसे फिल्म इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। इस फिल्म में उनके अभिनय की गहराई और संवेदनशीलता ने उन्हें आलोचकों और दर्शकों दोनों के दिलों में जगह दिलाई। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी पहचान मां के किरदार से आई।

1975 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘दीवार’ में निरूपा रॉय ने अमिताभ बच्चन की मां का किरदार निभाया। इस भूमिका ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। ‘दीवार’ के बाद उन्होंने लगातार फिल्मों में मां का रोल किया और उनका यह किरदार दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ गया। 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्मों जैसे ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘खून पसीना’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘सुहाग’, ‘इंकलाब’, ‘गिरफ्तार’, ‘मर्द’ और ‘गंगा-जमुना-सरस्वती’ में मां की भूमिका निभाई। इन फिल्मों में उनके किरदार में जो ममता, प्यार, दर्द और सहानुभूति दिखाई देती थी, वह हर दर्शक को भावविभोर कर देती थी।

निरूपा रॉय की मां वाली भूमिका इतनी प्रभावशाली थी कि उन्हें बॉलीवुड की “क्वीन ऑफ मिसरी” के नाम से भी जाना गया। उन्होंने अपने किरदारों में जो भावनात्मक गहराई और संवेदनशीलता दिखाई, वह किसी और अभिनेत्री में इतनी सटीक नहीं दिखाई देती थी। उनके अभिनय की यही खासियत उन्हें अन्य अभिनेत्रियों से अलग बनाती थी।

निरूपा रॉय का फिल्मी करियर लगभग पांच दशकों तक चला। इस दौरान उन्होंने करीब 300 फिल्मों में काम किया। शुरुआती दौर में वह लीड एक्ट्रेस के रूप में भी दिखाई दीं, लेकिन मां के किरदार ने उन्हें बॉलीवुड में अलग पहचान और सम्मान दिलाया। उन्होंने जिस तरह अपने किरदारों में मातृत्व, त्याग और सहानुभूति दिखाई, वह हर दिल को छू गई। उनकी मां वाली भूमिका केवल एक किरदार नहीं थी, बल्कि यह हर भारतीय दर्शक के लिए एक भावनात्मक अनुभव बन गई।

निरूपा रॉय की फिल्मों में जो आकर्षण था, वह सिर्फ उनके अभिनय में नहीं बल्कि उनके किरदारों में दिखाए गए प्यार, संघर्ष और ममता में था। दर्शक उनके किरदार को केवल पर्दे पर नहीं, बल्कि अपने जीवन से जोड़कर महसूस करते थे। यही कारण है कि वे आज भी “बॉलीवुड की मां” के नाम से जानी जाती हैं।

उनका जीवन और करियर हमें यह सिखाता है कि सही भूमिका और सही संवेदनशीलता के साथ निभाया गया किरदार दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ सकता है। निरूपा रॉय ने मां के किरदार को इतना जीवंत और भावपूर्ण बनाया कि यह भारतीय सिनेमा में एक मिसाल बन गया। उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा और आने वाली पीढ़ियां उन्हें एक आदर्श और प्रेरणास्रोत के रूप में देखती रहेंगी।

निरूपा रॉय की मां वाली छवि ने केवल फिल्मों में ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज में मातृत्व और त्याग की भावना को भी स्थापित किया। उनकी अदाकारी ने यह साबित कर दिया कि एक अभिनेता केवल मनोरंजन नहीं कर सकता, बल्कि भावनाओं और रिश्तों को पर्दे पर जीवंत कर सकता है। बॉलीवुड में उनकी यह पहचान हमेशा अमिट रहेगी।

 

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